एक मूलभूत प्रश्न: क्या सिनेमा केवल यथार्थ की नक़ल भर है?
सन् 1919 में ही जर्मनी के युवा कलाकारों को यह प्रश्न गहराई से विचलित करने लगा था कि क्या सिनेमा मात्र यथार्थ को पुनः प्रस्तुत करने का एक यांत्रिक साधन भर है। उनका तर्क था कि यथार्थ को पुनर्प्रस्तुत करने के मूलतः दो तरीक़े हो सकते हैं। पहले तरीक़े में किसी वास्तविक घटना को सीधे-सीधे कैमरे द्वारा फिल्मांकित करके, जैसा-का-तैसा प्रस्तुत किया जा सकता है — यह लुमिएर बंधुओं की परंपरा थी। दूसरे तरीक़े में, पहले से घट चुकी किसी वास्तविक घटना को स्मृति के आधार पर पुनर्निर्मित और पुनरभिनीत किया जाता है, तथा कल्पनाशील कैमरा-कोणों के माध्यम से अभिलेखित करके, कुशल संपादन के पश्चात् प्रस्तुत किया जाता है — इस दूसरे तरीक़े में कहानी को इतने सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है कि फ़िल्म की घटना वास्तविक घटना से भी कहीं अधिक जीवंत और प्राणवान प्रतीत होने लगे।
किंतु जर्मनी के इन युवा कलाकारों ने एक निर्णायक 'लेकिन' जोड़कर इस पूरी बहस को ही एक नई दिशा दे दी। उनका तर्क था कि यह सब कार्य तो उन्नीसवीं शताब्दी में ही स्तांदाल, बाल्ज़ाक, फ्लोबेयर, एमील ज़ोला, ओ० हेनरी तथा चेखव जैसे अनेक महान कथाकार साहित्य के माध्यम से पहले से ही बखूबी कर रहे थे — वे भी यथार्थ को पुनर्निर्मित करके, कुशल रचना-कौशल के सहारे, उसे मूल घटना से भी अधिक जीवंत बना चुके थे। तो फिर क्या यही सिनेमा का एकमात्र, समूचा कार्य था — यथार्थ की एक अधिक प्रभावशाली पुनर्प्रस्तुति भर? यदि सिनेमा केवल वही कर रहा था जो उपन्यास पहले ही कर चुका था, तो उसकी अपनी कोई मौलिक पहचान आख़िर कहाँ थी? जर्मनी के अभिव्यंजनावादियों (एक्सप्रेशनिस्ट्स) ने इसी मूलभूत प्रश्न का उत्तर खोजने का साहसिक प्रयत्न किया — और इस खोज ने सिनेमा-इतिहास की सर्वाधिक विवादास्पद तथा सर्वाधिक प्रभावशाली रचनाओं में से एक को जन्म दिया।
'द कैबिनेट ऑफ़ डॉ० कैलीगरी': एक पागल की आँखों से देखी गई दुनिया
कार्ल मायर और हांस जानोवित्ज़ द्वारा लिखित तथा रॉबर्ट वीने द्वारा निर्देशित 'द कैबिनेट ऑफ़ डॉ० कैलीगरी' की पटकथा सन् 1919 में लिखी गई थी, और यह फ़िल्म फ़रवरी 1920 में प्रदर्शित हुई — यह सिनेमा के इतिहास की सर्वाधिक विवादास्पद तथा सर्वाधिक विश्लेषित रचनाओं में से एक है। एक दिलचस्प किंवदंती इस फ़िल्म की उत्पत्ति से जुड़ी है — कहा जाता है कि फ़िल्म के सह-लेखक हांस जानोवित्ज़ एक रात किसी मेले में गए थे, और वहाँ निकट ही एक हत्या हो गई थी; जानोवित्ज़ ने उसी क्षण यह अनुभव किया कि वे स्वयं उस हत्यारे की पहचान कर सकते हैं — यह निजी अनुभव ही आगे चलकर फ़िल्म की मूल कथा का बीज बना।
फ़िल्म की कहानी एक मेले से आरंभ होती है, जहाँ रहस्यमय डॉक्टर कैलीगरी जादू का तमाशा प्रस्तुत करता है, और इसी के साथ-साथ शहर में हत्याओं का एक भयावह सिलसिला शुरू हो जाता है। एलन और फ्रांसिस दो घनिष्ठ मित्र हैं, जो दोनों ही एक ही स्त्री — जेन — से प्रेम करते हैं। तीनों डॉक्टर कैलीगरी के तंबू में जादू का प्रदर्शन देखने पहुँचते हैं, जहाँ नींद में चलने वाला (सोम्नैम्बुलिस्ट) सीज़र यह भयंकर भविष्यवाणी करता है कि एलन शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होगा। उसी रात वास्तव में एलन की हत्या हो जाती है। बाद में जब सीज़र जेन का अपहरण करने का प्रयत्न करता है, तो उसकी भी मृत्यु हो जाती है। किंतु फ़िल्म का सबसे चौंकाने वाला मोड़ अंत में आता है — यह संपूर्ण कथा वास्तव में फ्रांसिस नामक एक व्यक्ति के मस्तिष्क में घट रही है, जो यह कहानी किसी अन्य व्यक्ति को सुना रहा है। फ्रांसिस वस्तुतः एक मानसिक रोगी है, और इस पागलखाने का प्रमुख चिकित्सक ही वह व्यक्ति है, जिसे फ्रांसिस की कल्पना में 'डॉक्टर कैलीगरी' के रूप में चित्रित किया गया है।
अभिव्यंजनावाद का दृश्य-व्याकरण: जब स्थापत्य भी मनोविकृति बन गया
इस फ़िल्म की संपूर्ण दृश्य-संरचना ही उसका सबसे क्रांतिकारी पक्ष है। फ़िल्म में दीवारें, छतें और फ़र्श इस विकृत, कोणीय शैली में निर्मित किए गए हैं कि वास्तविक जीवन में ऐसा कोई भवन खड़ा ही नहीं रह सकता था। प्रत्येक पात्र की त्वचा पर कृत्रिम, मुरझाए हुए रंगों का प्रयोग किया गया है। खिड़कियों और दरवाज़ों को असामान्य, तिरछे आकार-प्रकार में गढ़ा गया है। जहाँ कहीं भी स्वाभाविक रूप से छायाएँ पड़नी चाहिए थीं, वहाँ उन्हें प्रकाश-व्यवस्था से नहीं, बल्कि सीधे दीवारों और फ़र्श पर रंग पोतकर चित्रित किया गया है — अर्थात् छाया स्वयं एक चित्रित, कृत्रिम तत्व बन गई है, प्रकाश की स्वाभाविक उपज नहीं। यहाँ तक कि उद्यान और बाग़ के दृश्य भी स्टूडियो के भीतर ही फिल्माए गए हैं — यह एक ऐसा संसार है, जहाँ वास्तविक सूर्य का प्रकाश कभी प्रवेश ही नहीं करता। एक मानसिक रोगी को यह दुनिया वास्तव में कैसी प्रतीत होती होगी, इसे हूबहू पर्दे पर उतार देने का यह साहसिक कलात्मक प्रयत्न ही 'द कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कैलीगरी' की सच्ची आत्मा है — यहाँ दृश्य-स्थापत्य कोई पृष्ठभूमि-सज्जा भर नहीं, बल्कि स्वयं पात्र की मनोदशा का प्रत्यक्ष, जीवंत विस्तार बन जाता है।
फ़िल्म की दो समांतर कथाएँ — फ्रांसिस द्वारा सुनाई गई मूल कहानी, तथा पागलखाने में फ्रांसिस का अपने डॉक्टर को हत्यारा मानकर एक सुसंगत, पूर्ण कथा गढ़ लेने का यह कृत्य — इन दोनों के परस्पर टकराव से यह फ़िल्म एक गहन, बहुअर्थी संवाद में परिवर्तित हो जाती है। इसी बहुअर्थता ने इस फ़िल्म को दशकों तक विवाद और व्याख्या का विषय बनाए रखा है — कौन हैं वास्तव में ये पागल? क्या वे संपूर्ण राष्ट्र के प्रतीक हैं? क्या नौकरशाही और पुलिस-तंत्र की जकड़न में फँसा समूचा राष्ट्र ही एक विशाल पागलखाना बन चुका है? क्या डॉक्टर कैलीगरी केवल फ्रांसिस की बीमार कल्पना में ही एक हत्यारा है, या वह किसी सत्तावादी शासक का प्रतीक है, जो अपने नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए उन्हें सम्मोहित कर देता है? यह प्रश्न इसलिए और भी गहन हो जाता है, क्योंकि फ़िल्म के अंत में डॉक्टर कैलीगरी यह आश्वासन देता है कि अब वह अपने रोगी की मनोदशा को पूर्णतः समझ चुका है, इसलिए अब वह उसका उपयुक्त 'इलाज' कर सकेगा — एक ऐसा वाक्य, जिसमें सत्ता और नियंत्रण की भाषा छिपी हुई प्रतीत होती है।
अभिव्यंजनावादी कला-आंदोलन की यह सिनेमाई प्रस्तुति अपने आप में एक अत्यंत सशक्त कृति थी। यह बात 'द कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कैलीगरी' के समर्थक और विरोधी, दोनों ही समान रूप से स्वीकार करते हैं कि यह एक असाधारण फ़िल्म है। प्रख्यात फ़िल्म-इतिहासकार पॉल रोथा ने इसके विषय में लिखा था, "यह सिनेमा की कला और सौंदर्य में पहला वास्तविक प्रगति-चिह्न है... यह पहली प्रामाणिक कल्पनात्मक फ़िल्म है; इस नए माध्यम में रचनात्मक मस्तिष्क की यह पहली सच्ची अभिव्यंजना है।" इसके विपरीत, सर्गेई आइज़ेंस्टीन का दृढ़ मत था, "हमारी स्वस्थ मानवीय कला को उसकी बाल्यावस्था में ही मार डालने का यह एक बर्बर प्रयास है।" यह तीखा वैचारिक विभाजन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि यह फ़िल्म किसी उदासीन प्रतिक्रिया को जन्म देने वाली साधारण कृति नहीं थी।
फ़्रांसीसी अतियथार्थवाद: एक स्त्री की आँख और एक उस्तरे का सदमा
जिस प्रकार जर्मनी में अभिव्यंजनावादी कलाकारों ने सिनेमा को अपनी कला-विधा को समृद्ध करने वाला एक सशक्त माध्यम मानकर 'द कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कैलीगरी' जैसी श्रेष्ठ रचना प्रस्तुत की, उसी प्रकार फ़्रांस के अतियथार्थवादियों (सुर्रियलिस्ट्स) ने भी श्रेष्ठ फ़िल्मकारों के सहयोग से मूक-फ़िल्म-युग की कुछ अत्यंत उत्तम रचनाएँ विश्व को दीं। अतियथार्थवादी फ़िल्म-धारा में मान रे, फ़र्नांद लेजे और मार्सेल दुशां जैसे कलाकारों ने भी कई महत्त्वपूर्ण फ़िल्म-कृतियाँ प्रस्तुत कीं। सन् 1924 में आंद्रे ब्रेतों द्वारा प्रस्तुत किए गए अतियथार्थवाद के घोषणापत्र (मेनिफेस्टो) के पश्चात्, इन कलाकारों ने सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर स्वयं को अभिव्यक्त करने के अनेक साहसिक प्रयत्न किए। इसी परंपरा के एक चरम बिंदु के रूप में, सन् 1929 में स्पेनिश कलाकार सल्वाडोर डाली और फ़िल्मकार लुई बुनुएल ने मिलकर 'अन शियां आंदालू' (Un Chien Andalou — 'एक अंदालूसी कुत्ता') नामक मूक फ़िल्म का निर्माण किया।
'अन शियां आंदालू' की सबसे पहली और सबसे मूलभूत घोषणा यही प्रतीत होती है कि आँख जो कुछ भी देख पाती है, वह अनिवार्यतः असत्य है। फ़िल्म के आरंभ में ही एक स्त्री की आँख को पूरे बड़े क्लोज़-अप में दिखाया जाता है। एक पुरुष उस आँख को अपने हाथ पर टिकाता है, और फिर एक उस्तरे से उसकी पुतली को दो टुकड़ों में चीर देता है — सिनेमा के इतिहास का यह सर्वाधिक सदमा देने वाला, सर्वाधिक चर्चित आरंभिक दृश्य है। इस भयावह शुरुआत से लेकर फ़िल्म के अंतिम दृश्य तक — जहाँ एक पुरुष और एक स्त्री 'बसंत ऋतु में' समुद्र के किनारे टहलते दिखाई देते हैं — इस संपूर्ण फ़िल्म में कहीं भी तार्किक क्रमबद्धता या कथात्मक एकसूत्रता खोजने का प्रयत्न व्यर्थ है, सिवाय इस एक संकेत के कि संभवतः वह पुरुष और वह स्त्री एक ही व्यक्ति के दो रूप हैं। सभ्य समाज की छद्म शालीनता और पाखंड को ध्वस्त कर देना ही अतियथार्थवादियों का मूल उद्देश्य था, और लुई बुनुएल की लगभग समस्त फ़िल्में इसी सभ्य, विनम्र समाज का खुलकर उपहास उड़ाती हैं। यह भी कहा जाता है कि अतियथार्थवाद को आत्मसात् करने वाले युवा कलाकार सन् 1924 से 1930 के दौरान पेरिस की सड़कों पर घूमते हुए ऐसी उद्दंड हरकतें किया करते थे, जिनसे आम जनता असहज और विचलित हो उठे — वे मार्ग में जाते किसी पादरी को व्यंग्यपूर्वक 'हैलो मदाम' कहकर संबोधित करते, और खुलेआम सड़कों पर 'फ़्रांस मुर्दाबाद', 'फ़्रांसीसी सेना मुर्दाबाद' जैसे उत्तेजक नारे लगाते।
'अन शियां आंदालू' में दर्शक को भ्रमित करने के लिए जो उपशीर्षक प्रयुक्त किए गए हैं, वे भी इसी कथा-विरोधी रणनीति का अंग हैं — 'बहुत दिन पुरानी बात है', 'आठ वर्ष बाद', 'लगभग तीन बजे के आसपास' — ये सब काल-संकेत किसी तार्किक समय-क्रम का निर्वाह नहीं करते, बल्कि उसका उपहास उड़ाते प्रतीत होते हैं। एक दृश्य में एक स्त्री अपने घर के भीतर घूम रही है और उसके बाल हवा में लहरा रहे हैं; अगले ही क्षण, बिना किसी तार्किक सेतु के, वह सीधे समुद्र-तट पर जा पहुँचती है। इन फ़िल्मों का मूल उद्देश्य यथार्थ की तार्किक संरचना को जड़ से तोड़ देना था। बुनुएल के अपने शब्दों में, "सिनेमा स्वप्न-लोक को, मानवीय भावनाओं को उनकी संपूर्णता में दिखाने और मानवीय संवेगों को चित्रित करने का सर्वोत्तम माध्यम है।" फ़िल्म में एक हाथ का क्लोज़-अप भी है, जिसके भीतर से चींटियाँ रेंगती हुई बाहर निकलती हैं — इस एकल शॉट की दशकों तक बीसियों भिन्न-भिन्न प्रकार से व्याख्या की जाती रही है, मानव की व्यक्तिगत मृत्यु से लेकर संपूर्ण मानव-जाति के विनाश तक, तथा हाथ के सुन्न पड़ जाने पर होने वाली शारीरिक सनसनाहट तक — इस एक बिंब की व्याख्याओं की यह विविधता स्वयं इस बात का प्रमाण है कि अतियथार्थवादी सिनेमा जानबूझकर एक निश्चित, बंद अर्थ के बजाय, अनंत संभावित अर्थों का द्वार खुला छोड़ देना चाहता था।
कालजयी प्रयोग, और यथार्थवाद की अंतिम विजय
'द कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कैलीगरी' और 'अन शियां आंदालू' जैसी अनेक अन्य प्रयोगधर्मी फ़िल्में मूक-फ़िल्म-युग की कलात्मक ऊँचाइयों का सजीव परिचय देती हैं। प्रत्येक पीढ़ी के युवाओं को ये फ़िल्में सदैव आकर्षित करती रही हैं; बिंबों के माध्यम से कही गई ये कथाएँ देश और काल, दोनों की सीमाओं को लाँघ जाने में सक्षम सिद्ध हुई हैं। इन फ़िल्मों में प्रत्येक युग के अनुरूप नया, ताज़ा अर्थ ग्रहण कर लेने की विलक्षण क्षमता विद्यमान है, और इसी कारण जिज्ञासु तथा चिंतनशील दर्शक इन कालजयी कृतियों के साथ सदैव एक गहरा जुड़ाव और अपनत्व अनुभव करते रहे हैं।
किंतु हमें इस ऐतिहासिक सत्य से भी इनकार नहीं करना चाहिए कि मूक-फ़िल्म-युग में अंततः विजय उन्हीं फ़िल्मकारों की हुई, जिन्होंने फ़िल्म के यथार्थवादी मूल ढाँचे को बनाए रखते हुए, कथात्मक तत्वों की सुरक्षा करते हुए, ऐसी फ़िल्में बनाने में सफलता प्राप्त की जो न तो बहुत उथली थीं, और न ही इतनी दुर्बोध और उलझी हुई कि सामान्य दर्शक उनसे पूर्णतः कट जाए। अभिव्यंजनावाद और अतियथार्थवाद ने सिनेमा की सीमाओं को विस्तृत अवश्य किया, किंतु सिनेमा का मुख्य प्रवाह (मेनस्ट्रीम) अंततः एक संतुलित, यथार्थवादी कथा-परंपरा की ओर ही लौट आया — यह इन प्रायोगिक आंदोलनों की असफलता नहीं, बल्कि उनकी स्थायी उपलब्धि थी, क्योंकि उन्होंने उस मुख्य प्रवाह को भी भीतर से समृद्ध कर दिया।
विरासत: इन फ़िल्मों को समझने वाली बाद की पुस्तकें
जर्मन अभिव्यंजनावादी सिनेमा और फ़्रांसीसी अतियथार्थवादी सिनेमा, दोनों को ही गंभीरता से समझने और संदर्भित करने वाली कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकें आगे के दशकों में लिखी गईं। सिगफ़्रीड क्राकाउअर ने अपनी बहुचर्चित कृति 'फ़्रॉम कैलीगरी टू हिटलर: अ साइकोलॉजिकल हिस्ट्री ऑफ़ द जर्मन फ़िल्म' (1947) में यह गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया कि किस प्रकार 'द कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कैलीगरी' से लेकर सन् 1933 तक के समस्त वाइमर-युगीन जर्मन सिनेमा में, सत्ता और सम्मोहन के प्रति एक अचेतन जर्मन मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति छिपी हुई थी, जिसने आगे चलकर फ़ासीवाद और हिटलर के उदय का पूर्वाभास दिया — यह एक विवादास्पद किंतु अत्यंत प्रभावशाली थीसिस सिद्ध हुई, जिसने जर्मन सिनेमा के अध्ययन की दिशा को दशकों तक प्रभावित किया।
जर्मन मूल की फ़िल्म-इतिहासकार लोटे आइज़्नर ने अपनी कृति 'द हॉन्टेड स्क्रीन' (1952) में अभिव्यंजनावादी सिनेमा के दृश्य-सौंदर्यशास्त्र का एक अत्यंत विस्तृत तथा सहानुभूतिपूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने इन फ़िल्मों की जड़ें जर्मन रूमानी (रोमांटिक) साहित्यिक परंपरा और स्वच्छंदतावादी चित्रकला में खोजीं — यह कृति क्राकाउअर की राजनीतिक-मनोवैज्ञानिक व्याख्या के समानांतर एक अधिक सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। अतियथार्थवादी सिनेमा के क्षेत्र में, ग्रीक मूल के फ़्रांसीसी लेखक आदो क्यरू की कृति 'ल सुर्रेयालिज़्म ओ सिनेमा' (अतियथार्थवाद और सिनेमा, 1953) को इस विषय पर पहला विस्तृत, व्यवस्थित अध्ययन माना जाता है, जबकि बाद में पॉल हैमंड द्वारा संपादित संकलन 'द शैडो एंड इट्स शैडो: सुर्रियलिस्ट राइटिंग्स ऑन द सिनेमा' ने अतियथार्थवादी फ़िल्मकारों और सिद्धांतकारों के मूल लेखों को अंग्रेज़ी-भाषी पाठकों तक सुलभ कराया।
इन पुस्तकों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि जर्मनी और फ़्रांस के ये साहसिक प्रयोग केवल अपने समय की सनक बनकर न रह जाएँ, बल्कि सिनेमा-सिद्धांत के स्थायी अध्ययन-क्षेत्र का अभिन्न अंग बन सकें — एक ऐसी विरासत, जो आज भी फ़िल्म-विद्यालयों में उतनी ही गंभीरता से पढ़ाई जाती है, जितनी गंभीरता से स्वयं इन फ़िल्मों को उनके निर्माण के समय बनाया गया था।
भारत में समांतर यात्रा: व्यवसाय और कला का द्वंद्व
भारत में भी अपनी ही कलात्मक परंपरा का पालन करते हुए, सिनेमा को शुद्ध व्यवसाय मानने वाले, तथा सिनेमा को आत्माभिव्यक्ति की एक गंभीर कला मानने वाले — इन दोनों ही प्रकार के फ़िल्मकारों ने अपनी-अपनी यात्रा समानांतर रूप से जारी रखी। यह कभी नहीं हुआ कि व्यावसायिक फ़िल्मकारों के समक्ष कलात्मक दृष्टि रखने वाले फ़िल्मकारों ने पूर्णतः घुटने टेक दिए हों — भारतीय सिनेमा का इतिहास भी इसी प्रकार के संघर्षशील फ़िल्मकारों के अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है। दादा साहेब फालके के सिनेमा को एक सुव्यवस्थित व्यावसायिक मोड़ देने वाले पहले प्रमुख फ़िल्मकार-उद्यमी जमशेदजी फ्रामजी मदन थे, जिन्होंने अपनी मदन थियेटर्स कंपनी के माध्यम से भारतीय सिनेमा को वितरण और प्रदर्शन के एक संगठित औद्योगिक ढाँचे में ढालने का कार्य किया।
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