रेटिंग: ★★ (4 में से)
निर्देशक: बालाजी मोहन निर्माता: आनंद एल. राय, हिमांशु शर्मा स्टूडियो: कलर येलो, अमेज़न एमजीएम स्टूडियोज़ लेखन: हिमांशु शर्मा, दिव्य निधि शर्मा संगीत: जी.वी. प्रकाश कुमार कलाकार: यामी गौतम धर (मोहिनी), आदिनाथ एम. कोठारे (राजा अवस्थी), अनुराग ठाकुर (बंटू अवस्थी), मीता वशिष्ठ, सुनीता राजवार, आदित्य कुलश्रेष्ठ, सुष्मिता मुखर्जी प्रमाणपत्र: UA 16+ अवधि: 138 मिनट भाषा: हिंदी रिलीज़: 16 अक्टूबर 2026 (सिनेमाघरों में)
बंटू अवस्थी (अनुराग ठाकुर) ने पूरे परिवार को बैठक में बुला लिया है। उसके पास सबूत हैं: पिछले कुछ महीनों की एक-एक घटना, भाभी के आने के बाद घर में हुए हर चमत्कार का हिसाब, और जंगल में अकेले पूजा करती भाभी को अपनी आँखों से देखने की गवाही। परिवार हँसता है, फिर थोड़ा सहमता है, फिर हँसता है। बंटू का निष्कर्ष सीधा है: घर में आई नई बहू मोहिनी (यामी गौतम धर) कोई साधारण औरत नहीं, डायन है। यह 'नई नवेली' का सबसे अच्छा दृश्य है, क्योंकि इसमें एक सचमुच दिलचस्प सवाल छिपा है।
सवाल यह है कि जो औरत सब कुछ सँभाल लेती है, वह शक के घेरे में क्यों आ जाती है? मोहिनी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की इंडिया हेड है। मेरठ के अवस्थी परिवार के बिखरे, शोर भरे संयुक्त घर में वह आती है और कुछ ही दिनों में सब ठीक होने लगता है: हिसाब, रिश्ते, किस्मत। हमारे घरों में ऐसी बहू को लक्ष्मी कहा जाता है। बंटू उसे डायन कहता है। दोनों शब्द एक ही औरत के लिए हैं, और फर्क सिर्फ इतना है कि देखने वाला आभारी है या डरा हुआ। यह एक सचमुच साहसी हॉरर-कॉमेडी का बीज था।
घर की औरत पर शक भारतीय सिनेमा के लिए नया विषय नहीं है। 1993 में फाज़िल की मलयालम फिल्म 'मणिचित्रताळु' ने एक नवविवाहिता के भीतर बसी प्रेतछाया की कहानी को मनोविज्ञान के सवाल में बदल दिया था, और शोभना ने उसके लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। प्रियदर्शन ने उसी कहानी से 2007 में 'भूल भुलैया' बनाई। और असल हिंदुस्तान में 'डायन' कोई मज़ाक नहीं है। देश के कई हिस्सों में आज भी औरतों को डायन बताकर पीटा और मारा जाता है; बिहार ने 1999 में डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनाया और झारखंड ने उसके बाद। 'नई नवेली' इस अँधेरे से अनजान नहीं है। फिल्म शुरू होने से पहले एक लंबी चेतावनी आती है, जो अंधविश्वास और आस्था के शोषण के खिलाफ आगाह करती है। असली सवाल यह है कि उस चेतावनी के बाद फिल्म क्या करती है।
निर्देशक बालाजी मोहन तमिल सिनेमा से आए हैं, जहाँ उन्होंने 'कादलिल सोदप्पुवदु येप्पडि' जैसी हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी और धनुष के साथ 'मारी' और 'मारी 2' बनाईं। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म है, और पटकथा हिमांशु शर्मा और दिव्य निधि शर्मा की है। 'तनु वेड्स मनु' और 'रांझणा' के लेखक हिमांशु शर्मा उत्तर भारत के छोटे शहरों की ज़बान और घरेलू नोकझोंक को बहुत कम लोगों की तरह जानते हैं, और पहले हिस्से में यह साफ दिखता है। अवस्थी परिवार का घर शोर, तानों और अधूरे झगड़ों से भरा है। द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया में राहुल देसाई ने पहले हिस्से की तुलना 'गुल्लक' से की है, और तुलना ठीक बैठती है: लगता है जैसे हम एक जाने-पहचाने मध्यवर्गीय घर में आ गए हों, जहाँ अचानक कुछ अलौकिक घटने लगा है।
फिर इंटरवल आता है, और फिल्म अपना घर छोड़ देती है। दूसरा हिस्सा पहले हिस्से के कई दृश्यों को दूसरी नज़र से दोबारा दिखाता है, ताकि बंटू पर यकीन करने के लिए हमें थोड़ी शर्म आए, और फिर कहानी त्रेता युग, रामायण और रावण से जुड़ी एक रहस्यमयी वस्तु की ओर मुड़ जाती है। मोहिनी का पति राजा (आदिनाथ एम. कोठारे) बदलने लगता है, कुछ ऐसा बनने लगता है जो इंसान नहीं है, और हॉरर-कॉमेडी देखते-देखते एक शोर भरा पौराणिक एक्शन ड्रामा बन जाती है।
भारतीय काव्यशास्त्र के पास इस समस्या का नाम है। आनंदवर्धन ने 'ध्वन्यालोक' में कहा था कि किसी प्रबंध में अनेक रस हो सकते हैं, लेकिन जो कवि रचना की उत्कृष्टता चाहता है, उसे एक रस को अंगी, यानी प्रधान, बनाना चाहिए और बाकी रसों को उसका अंग। हॉरर-कॉमेडी अपने आप में हास्य और भयानक का मेल है, जो मुश्किल है पर असंभव नहीं; 'स्त्री' ने यह करके दिखाया था, क्योंकि उसमें हास्य हमेशा प्रधान रहा और डर उसका अंग। 'नई नवेली' में कोई अंगी रस नहीं है। पहले हिस्से में हास्य है, दूसरे में अद्भुत और वीर, बीच-बीच में भक्ति, और भयानक, जिसका वादा पोस्टर पर था, कहीं जड़ नहीं पकड़ता। फिल्म हर रस को छूती है और किसी में ठहरती नहीं।
रामायण का इस्तेमाल भी इसी दिक्कत का हिस्सा है। दूसरे हिस्से का बड़ा समय मोहिनी परिवार को वाल्मीकि की कथा समझाने में बिताती है, चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान लिए। पौराणिक कथाएँ सिनेमा के लिए अद्भुत कच्चा माल हैं, बशर्ते वे कहानी में घुलें। वाल्मीकि का रावण केवल बुराई का पुतला नहीं है; वह विद्वान है, शिवभक्त है, और उसका पतन इसलिए अर्थ रखता है कि उसकी महानता उसे उसके अहंकार से नहीं बचा पाती। यहाँ वह कहानी को आगे धकेलने का एक बहाना भर रह जाता है। हिचकॉक ऐसी चीज़ को 'मैकगफिन' कहते थे: वह वस्तु जिसके पीछे सब भागते हैं, पर जिसका अपने आप में कोई महत्व नहीं होता। कुछ दर्शकों को फिल्म का यह देसी पौराणिक रंग भाया है, और कुछ समीक्षकों को इसकी धार्मिकता ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोरदार लगी है। मेरी शिकायत सरल है: श्रद्धा कहानी का विकल्प नहीं हो सकती।
इस सबके बीच यामी गौतम धर फिल्म का सबसे भरोसेमंद सहारा हैं। 'विकी डोनर' से 'आर्टिकल 370' और 'हक' तक उन्होंने खुद को एक ऐसी अभिनेत्री के रूप में गढ़ा है जो संयम से असर पैदा करती है, और हाल में मिला राष्ट्रीय पुरस्कार उसी सफर की पहचान है। मोहिनी के रूप में वे एक अजीब-सी, लगभग बेचैन कर देने वाली शांति लाती हैं। पहले हिस्से में वे इतनी विश्वसनीय ढंग से किसी दूसरी दुनिया की लगती हैं कि हम बंटू के साथ हो लेते हैं, और यही फिल्म का सबसे अच्छा खेल है। दूसरे हिस्से में उन्हें उपदेश थमा दिए जाते हैं, और कोई भी अभिनेता उपदेशों को चरित्र में नहीं बदल सकता।
फिल्म का ज़्यादातर हास्य अनुराग ठाकुर के कंधों पर है, और बंटू के रूप में वे सबसे ज़्यादा ठहाके बटोरते हैं: शक्की, ज़िद्दी, और अपनी ही साज़िश-कथाओं में उलझा हुआ देवर। उनकी टाइमिंग अच्छी है, हालाँकि लंबे स्क्रीन टाइम में किरदार कुछ दोहराव का शिकार होता है। आदिनाथ एम. कोठारे, जिन्हें हिंदी दर्शक '83' में दिलीप वेंगसरकर के रूप में देख चुके हैं, राजा को एक सौम्य गर्माहट देते हैं और उसके रूपांतरण से जितना निकाला जा सकता है, निकालते हैं, हालाँकि वीएफएक्स इस रूपांतरण को डरावना कम और कृत्रिम ज़्यादा बना देता है। सबसे बड़ा अफसोस मीता वशिष्ठ और सुनीता राजवार को लेकर है। मीता वशिष्ठ वह अभिनेत्री हैं जिन्होंने मणि कौल की 'सिद्धेश्वरी' में ठुमरी गायिका सिद्धेश्वरी देवी को जिया था; सुनीता राजवार को देश 'पंचायत' की क्रांति देवी के रूप में पहचानता है। यहाँ दोनों एक भरे-पूरे घर की भीड़ का हिस्सा भर हैं। घर में लोग बहुत हैं, किरदार कम।
जी.वी. प्रकाश कुमार तमिल सिनेमा के सबसे सफल संगीतकारों में गिने जाते हैं, लेकिन यहाँ उनका बैकग्राउंड स्कोर कई जगह दृश्यों पर चढ़ बैठता है, जैसे डर पैदा करने की ज़िम्मेदारी अकेले उसी की हो। गानों में से कोई भी थिएटर के बाहर तक साथ नहीं आता। और वीएफएक्स, जिस पर दूसरे हिस्से का पूरा तमाशा टिका है, वह भरोसा नहीं जगा पाता जिसकी किसी भी फैंटेसी को ज़रूरत होती है।
बॉक्स ऑफिस पर दशहरे की छुट्टियों और हॉरर-कॉमेडी की लोकप्रियता ने फिल्म का साथ दिया है। 16 अक्टूबर को 'नई नवेली' ने भारत में लगभग ₹3.25 करोड़ नेट से शुरुआत की और उसी दिन रिलीज़ हुई राजकुमार राव की 'प्रहार' से आगे रही। शनिवार को कमाई करीब 23 प्रतिशत बढ़कर ₹4 करोड़ हुई, जिससे दो दिनों का घरेलू आँकड़ा ₹7.25 करोड़ नेट और विश्वभर का आँकड़ा ₹10 करोड़ ग्रॉस के पार पहुँच गया। त्योहार के मौसम में परिवार एक हल्की-फुल्की फिल्म चाहते हैं, और यह फिल्म उसी उम्मीद के सहारे चल रही है।
हमारे यहाँ नई बहू गृहप्रवेश के समय चावल से भरा कलश पैर से हल्के से गिराकर घर में आती है। उस पल वह लक्ष्मी कहलाती है। 'नई नवेली' के पास यह पूछने का मौका था कि वही लक्ष्मी कब और क्यों डायन कहलाने लगती है, और जवाब शायद इतना ही है: जिस दिन वह वैसी नहीं रहती जैसी घर ने चाही थी। फिल्म उस दरवाज़े तक पहुँचती है, देहरी पर खड़ी होती है, और फिर भीतर झाँकने के बजाय त्रेता युग की ओर मुड़ जाती है। कलश गिर चुका है, चावल देहरी पर बिखरे हैं, और फिल्म उन्हें वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाती है।
इसी दिन रिलीज़ हुई 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' की समीक्षा भी रिपब्लिक ऑफ सिनेमा पर पढ़ें।
💬 Discussion
0 comments