सिनेमा पर लिखी गई पहली पुस्तक: जब एक कवि ने चलचित्र को कला घोषित किया
एक मूक कला को गंभीरता से लेने का पहला साहस
सन् 1915 में, जब सिनेमा को विश्वभर में अभी एक सस्ता, क्षणभंगुर तमाशा ही माना जाता था, अमरीका के प्रसिद्ध कवि वैचेल लिंडसे ने एक ऐसी पुस्तक लिखी, जिसने सिनेमा के बारे में सोचने के ढंग को सदा के लिए बदल डाला , 'द आर्ट ऑफ़ द मूविंग पिक्चर्स'। यह पुस्तक अपने आप में एक साहसिक घोषणा थी, क्योंकि लिंडसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यह आग्रहपूर्वक प्रतिपादित किया कि पर्दे पर चलते-फिरते ये बिंब कोई तुच्छ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सुगठित, गंभीर कला-रूप हैं, जिसका विश्लेषण उसी गंभीरता से किया जाना चाहिए जिस गंभीरता से कविता, चित्रकला या शिल्पकला का किया जाता है। उस दौर में, जब स्वयं फिल्मकार और दर्शक दोनों ही इस माध्यम को रंगमंच की एक सस्ती नक़ल से अधिक कुछ नहीं समझते थे, एक प्रतिष्ठित कवि का इस तरह खुलकर सिनेमा के पक्ष में खड़ा होना अपने-आप में क्रांतिकारी घटना थी।
छायानाट्य की तीन कोटियाँ: आधी शताब्दी तक चलने वाला वर्गीकरण
लिंडसे ने फ़िल्मों को तीन मूल कोटियों में विभाजित किया , 'घटना-प्रधान छायानाट्य' (एक्शन फ़ोटोप्ले), 'अंतरंग छायानाट्य' (इन्टिमेट फ़ोटोप्ले), और 'भव्यतापूर्ण छायानाट्य' (स्प्लेंडर फ़ोटोप्ले)। यह वर्गीकरण किसी अमूर्त सिद्धांत से नहीं, बल्कि अपने समय की कथात्मक और कलात्मक प्रवृत्तियों के गहन, सूक्ष्म निरीक्षण से उपजा था , और इसी कारण यह इतना सटीक और स्थायी सिद्ध हुआ कि आगे आने वाली लगभग आधी शताब्दी तक बनने वाली फ़िल्में भी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, इन्हीं तीन साँचों में समायी रहीं।
लिंडसे यहीं नहीं रुके। उन्होंने फ़िल्म की तुलना पूर्व-स्थापित शास्त्रीय कलाओं से करते हुए तीन और महत्त्वपूर्ण पद गढ़े , 'गतिशील-स्थापत्य' (स्कल्पचर-इन-मोशन), 'गतिशील-चित्रकला' (पेंटिंग-इन-मोशन), और 'गतिशील-शिल्पकला' (आर्किटेक्चर-इन-मोशन)। इस तुलना के माध्यम से लिंडसे यह सिद्ध करना चाहते थे कि सिनेमा किसी शून्य से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यह मानव-सभ्यता की दृश्य-कलाओं की उसी सुदीर्घ परंपरा का स्वाभाविक, आधुनिकतम विस्तार है, जो गुफाओं की भित्ति-चित्रकला से आरंभ होकर आज तक चली आ रही है। लिंडसे का यह कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि आधुनिक युग में फ़िल्म-कला का वही सांस्कृतिक महत्त्व है, जो पुरातन युग में मानव द्वारा गुफाओं में आकृतियाँ उकेरने की कला का रहा होगा , अर्थात् सिनेमा को उन्होंने मानव-जाति की सबसे आदिम, सबसे मौलिक सृजनात्मक प्रवृत्ति की ही एक नवीन अभिव्यक्ति के रूप में देखा।
रंगमंच की जकड़न से मुक्ति: एक वैचारिक क्रांति
सन् 1915 में फ़िल्मों की जो धारा उच्च-भ्रू (हाई-ब्रो) वर्ग में प्रशंसा का विषय बनी हुई थी, वह लगभग पूर्णतः रंगमंचीय नाटकों का फिल्मांकित रूप भर थी , अर्थात् कैमरा एक स्थिर दर्शक की भाँति मंच के सामने बैठा रहता, और सिनेमा स्वयं की कोई स्वतंत्र भाषा गढ़ने का साहस नहीं कर पाता था। किंतु लिंडसे ने 'द बर्थ ऑफ़ ए नेशन' , डेविड वार्क ग्रिफ़िथ की महत्त्वाकांक्षी फ़िल्म , देखने के बाद यह निर्णायक निष्कर्ष निकाला कि श्रेष्ठ सिनेमा वही होगा, जो रंगमंच के इस प्रभाव से पूर्णतः मुक्त हो सकेगा। अपनी पुस्तक के अगले अध्याय, 'छायानाट्यों और रंगमंच में तीस मूलभूत अंतर' में उन्होंने इस भेद की अत्यंत विशद और सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत की , और इस प्रकार बीसवीं शताब्दी के दूसरे ही दशक में सिनेमा को रंगमंच की सुदृढ़ जकड़न से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र पहचान गढ़ने का सैद्धांतिक साहस प्रदान किया। लिंडसे के ये तीस सूत्र आगे आने वाले वर्षों तक फ़िल्म-सिद्धांतकारों के लिए एक स्थायी प्रेरणा-स्रोत बने रहे।
एक क्रांतिकारी सुझाव: मौन का महत्व
अपनी पुस्तक के अंतिम अध्याय में लिंडसे ने एक अत्यंत व्यावहारिक, किंतु अपने समय से कहीं आगे का सुझाव दिया , उनका मानना था कि मूक फ़िल्म के पर्दे पर चलते समय संगीत बिल्कुल नहीं बजना चाहिए। उस दौर में, जब प्रत्येक सिनेमाघर में फ़िल्म के साथ निरंतर पियानो या ऑर्केस्ट्रा बजाया जाना एक अनिवार्य परंपरा बन चुका था, यह सुझाव वास्तव में क्रांतिकारी था। इसके पीछे लिंडसे की मूल मान्यता यही थी कि यदि दृश्य-बिंब अपने-आप में पर्याप्त शक्तिशाली हों, तो उन्हें किसी बाहरी संगीत की बैसाखी की आवश्यकता नहीं रहनी चाहिए , यह सुझाव फ़िल्म को एक सहायक, शोषक (पैरासाइटिक) विधा के खाने से बाहर निकालकर, उसे एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर वैचारिक आधार प्रदान करने की दिशा में एक ठोस क़दम था।
लिंडसे के बाद: फ़िल्म-सिद्धांत की बढ़ती हुई परंपरा
वैचेल लिंडसे की यह पुस्तक कोई अकेली, अलग-थलग घटना नहीं थी , इसने आने वाले दशकों में फ़िल्म को एक गंभीर बौद्धिक अनुशासन के रूप में स्थापित करने वाली एक संपूर्ण परंपरा की नींव रखी। लिंडसे के मात्र एक वर्ष बाद, सन् 1916 में, हार्वर्ड के जर्मन-अमरीकी मनोवैज्ञानिक ह्यूगो म्यूंस्टरबर्ग ने 'द फ़ोटोप्ले: अ साइकोलॉजिकल स्टडी' प्रकाशित की , यह पहली पुस्तक थी, जिसने सिनेमा को मनोविज्ञान की दृष्टि से परखा, और यह दिखाया कि कैसे क्लोज़-अप, फ़्लैशबैक और संपादन जैसी तकनीकें दर्शक के मस्तिष्क की ध्यान, स्मृति और कल्पना की प्रक्रियाओं की ही सिनेमाई प्रतिकृति हैं।
इसके बाद हंगरी के विचारक बेला बालाज़ ने 'विज़िबल मैन' (1924) तथा 'द स्पिरिट ऑफ़ फ़िल्म' (1930) जैसी कृतियों में यह तर्क दिया कि क्लोज़-अप ने मानव चेहरे को एक नई भाषा में पढ़ने की कला सिखाई है। जर्मन मनोवैज्ञानिक एवं कला-समीक्षक रुडोल्फ़ आर्नहाइम ने सन् 1932 में 'फ़िल्म ऐज़ आर्ट' में यह प्रतिपादित किया कि सिनेमा की यथार्थ को हूबहू प्रस्तुत कर पाने की सीमाएँ ही, विरोधाभासी ढंग से, उसकी सबसे बड़ी कलात्मक शक्ति का स्रोत हैं। रूस में सर्गेई आइज़ेंस्टीन और वी० आई० पुदोव्किन ने संपादन के सिद्धांत (मॉन्ताज) पर क्रांतिकारी लेख लिखे, जबकि जर्मनी के सिगफ़्रीड क्राकाउअर ने 'थियरी ऑफ़ फ़िल्म' (1960) में यथार्थ के पुनरुद्धार के माध्यम के रूप में सिनेमा के सार को परिभाषित करने का प्रयास किया।
फ़्रांसीसी समालोचक आंद्रे बाज़ाँ का बहुखंडीय निबंध-संग्रह 'कु-एस्त्स-स क ल सिनेमा?' (जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद 'व्हाट इज़ सिनेमा?' के नाम से प्रसिद्ध हुआ) इस परंपरा की अगली बड़ी कड़ी सिद्ध हुआ, जिसमें बाज़ाँ ने यथार्थवाद और गहरे फ़ोकस (डीप फ़ोकस) के सौंदर्यशास्त्र को प्रतिष्ठित किया। इसी शृंखला में आगे चलकर रूसी फिल्मकार आंद्रेई तारकोवस्की की 'स्कल्प्टिंग इन टाइम', फ़्रांसीसी निर्देशक रोबेर ब्रेसों के 'नोट्स ऑन द सिनेमैटोग्राफ़', तथा जेम्स मोनाको की 'हाउ टु रीड अ फ़िल्म' और डेविड बोर्डवेल व क्रिस्टिन थॉम्पसन की 'फ़िल्म आर्ट' जैसी कृतियाँ सम्मिलित हुईं, जिन्होंने सिनेमा-अध्ययन को विश्वविद्यालयों के भीतर एक सुस्थापित अकादमिक अनुशासन का दर्जा दिला दिया। इस प्रकार, वैचेल लिंडसे की सन् 1915 की वह पहली, अकेली आवाज़, आगे चलकर सिनेमा-सिद्धांत की एक समृद्ध, विश्वव्यापी बौद्धिक परंपरा में परिणत हो गई , एक ऐसी परंपरा, जिसकी नींव में आज भी लिंडसे का वह मौलिक विश्वास जीवित है: कि पर्दे पर चलते-फिरते बिंब मनुष्य की सबसे प्राचीन सृजनात्मक प्रवृत्ति की ही एक नई, आधुनिक अभिव्यक्ति हैं।
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