एक दृश्य की कल्पना कीजिए।
एक आदमी कमरे में बैठा है। वह चाय पी रहा है। खिड़की से धूप आ रही है। बाहर बच्चे खेल रहे हैं। वह उठता है, खिड़की बंद करता है, वापस बैठ जाता है।
यह दृश्य ठीक से लिखा जा सकता है, सुंदर भी हो सकता है, और अच्छे कैमरे से बहुत अच्छा दिख भी सकता है। फिर भी इसमें फिल्म नहीं है। कुछ भी दाँव पर नहीं लगा है।
अब इसमें एक चीज जोड़िए। कमरे में एक और आदमी है जो उससे कह रहा है कि आज शाम तक मकान खाली कर दो।
एक वाक्य जुड़ा और दृश्य जीवित हो गया। यही संघर्ष है, और यही वह चीज है जिसके बिना कहानी नहीं बनती।
संघर्ष क्या है
संघर्ष का अर्थ लड़ाई नहीं है। बंदूक, थप्पड़ और चीखें संघर्ष के सबसे सस्ते रूप हैं, और अक्सर सबसे कमजोर भी।
संघर्ष का अर्थ है दो इच्छाओं का आमने-सामने आ जाना, जहाँ दोनों में से किसी का पूरा होना दूसरे का खत्म होना है।
'मुग़ल-ए-आज़म' का पूरा भार इसी एक बात पर टिका है। सलीम अनारकली को चाहता है। अकबर मुगल सल्तनत की मर्यादा चाहता है। दोनों इच्छाएँ अपनी जगह जायज हैं, और दोनों एक साथ पूरी नहीं हो सकतीं। इसीलिए वह फिल्म आज भी भारी पड़ती है।
जहाँ दोनों इच्छाएँ साथ-साथ पूरी हो सकती हों, वहाँ केवल असुविधा होती है, नाटक नहीं।
विरोध की एकता
लाजोस एग्री ने इस पर जो सिद्धांत दिया, वह पटकथा-लेखन के सबसे उपयोगी औजारों में से है। उन्होंने कहा कि टकराव तभी तक चलता है जब तक दोनों पक्ष उससे भाग न सकें। उन्होंने इसे विरोधियों की एकता कहा।
इसकी जाँच का एक सवाल है, और यह सवाल हर लेखक को अपनी कहानी से पूछना चाहिए।
क्या मेरा नायक इस झगड़े से उठकर जा सकता है?
अगर उत्तर हाँ है, तो आपके पास कहानी नहीं है। अगर वह नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी पकड़ सकता है, अगर वह गाँव छोड़कर शहर जा सकता है, अगर वह माफी माँगकर मामला खत्म कर सकता है, तो दर्शक भी यही सोचेगा, और सोचते ही फिल्म से बाहर निकल जाएगा।
'मदर इंडिया' में राधा अपने बेटे से भाग नहीं सकती, क्योंकि वह उसका बेटा है। 'दृश्यम' में विजय अपने परिवार को छोड़कर नहीं जा सकता, और पुलिस अफसर अपने बेटे की तलाश छोड़ नहीं सकती। दोनों तरफ ऐसी वजह है जो जाने नहीं देती।
इसलिए कहानी बनाते समय केवल टकराव मत गढ़िए। वह ताला भी गढ़िए जो दोनों को एक कमरे में बंद रखे। खून का रिश्ता, नौकरी की मजबूरी, कर्ज, प्रतिज्ञा, बीमारी, बंद रास्ता, कोई भी चीज जो निकलने का दरवाजा बंद कर दे।
संघर्ष के चार दर्जे
एग्री का दूसरा बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने संघर्ष को दर्जों में बाँटा। यह बँटवारा इसलिए कीमती है क्योंकि इससे पता चलता है कि आपका दृश्य किस जगह बीमार है।
स्थिर संघर्ष। यहाँ टकराव तो है, लेकिन वह एक ही जगह घूमता रहता है। दो लोग बहस करते हैं, दस पंक्तियों के बाद भी वे वहीं खड़े हैं जहाँ शुरू में थे। हिंदी फिल्मों के कई भावुक दृश्य इसी बीमारी से मरते हैं। पहचान का तरीका सरल है। दृश्य के शुरू और अंत की स्थिति लिखिए। अगर दोनों एक जैसी हैं, तो संघर्ष स्थिर है।
उछलता संघर्ष। यहाँ उल्टी बीमारी है। पात्र एक पंक्ति में शांत है और अगली पंक्ति में उसे मारने पर उतारू है। बीच की सीढ़ियाँ गायब हैं। दर्शक चौंकता जरूर है, पर मानता नहीं। यह प्रायः तब होता है जब लेखक जल्दी में होता है और मोड़ को कमाने के बजाय घोषित कर देता है।
बढ़ता संघर्ष। यही वह चीज है जिसकी हमें जरूरत है। हर पंक्ति के साथ दबाव थोड़ा और बढ़ता है, हर मोड़ पर पात्रों के पास विकल्प थोड़ा और कम बचता है। बढ़ता संघर्ष सीढ़ी की तरह होता है, और दर्शक बिना जाने उस सीढ़ी पर चढ़ता जाता है।
पूर्वाभास वाला संघर्ष। यह संघर्ष का वह रूप है जो अभी आया नहीं है, लेकिन जिसकी आहट दर्शक को सुनाई दे चुकी है। दीवार पर टँगी बंदूक, दरवाजे पर आया नोटिस, डॉक्टर का आधा वाक्य। यह दर्शक के भीतर प्रतीक्षा बनाता है, और प्रतीक्षा ही नाटक का ईंधन है।
एक अच्छी पटकथा में तीसरा और चौथा दर्जा काम करता है, और पहले दो दर्जे केवल वहाँ आते हैं जहाँ लेखक ने उन्हें जानबूझकर रखा हो।
धर्मसंकट: भारतीय परंपरा का संघर्ष
पश्चिमी नाट्य-परंपरा का ज्यादातर संघर्ष सही और गलत के बीच है। भारतीय महाकाव्य परंपरा ने एक और चीज पर काम किया है, और मेरी समझ में वह ज्यादा कठिन और ज्यादा गहरी है। वह है दो सही चीजों के बीच का टकराव।
अर्जुन कुरुक्षेत्र में जिस स्थिति में खड़ा है, वहाँ कोई खलनायक नहीं है। एक तरफ उसका क्षत्रिय-धर्म है, दूसरी तरफ उसका कुल-धर्म है। दोनों सही हैं। इसीलिए गीता का प्रश्न आज तक जिंदा है।
कर्ण की स्थिति इससे भी क्रूर है। कृतज्ञता उसे दुर्योधन से बाँधती है, और जन्म का सच उसे पांडवों से। वह जिस भी तरफ जाएगा, कुछ न कुछ तोड़ेगा।
इस परंपरा का सीधा असर हमारी फिल्मों पर है। भारतीय दर्शक कर्तव्य और इच्छा के बीच फँसे आदमी को तुरंत पहचानता है, क्योंकि वह स्थिति उसकी अपनी जिंदगी में भी है। मुख्यधारा हो या समानांतर, हमारी सबसे मजबूत फिल्में प्रायः यहीं से आती हैं।
अपनी कहानी में इसे आजमाने का तरीका यह है। नायक के सामने जो चुनाव है, उसमें से आसान विकल्प हटा दीजिए। उसे वह जगह दीजिए जहाँ दोनों रास्ते सही हों और दोनों कुछ कीमत माँगें।
दबाव कैसे बढ़ाएँ
संघर्ष बनाने के बाद अगला सवाल यह है कि उसे तेज कैसे किया जाए। चार व्यावहारिक तरीके हैं।
समय की सीमा लगाइए। जिस काम को कभी भी किया जा सकता है, उसमें तनाव नहीं होता। शाम तक, कल सुबह तक, तीसरे दिन तक, इतना जोड़ते ही दृश्य कसने लगता है।
विकल्प छीनते जाइए। हर मोड़ पर नायक के पास एक रास्ता कम होना चाहिए। कहानी का आखिरी हिस्सा वह है जहाँ उसके पास केवल एक रास्ता बचा हो, और वह भी भारी कीमत वाला।
कीमत बढ़ाइए। शुरू में जो चीज नौकरी की थी, वह बीच में इज्जत की हो जाए, और अंत तक किसी की जान की।
विरोधी को मजबूत कीजिए। नायक की ऊँचाई नापने का पैमाना उसका विरोधी है। कमजोर गब्बर के सामने ठाकुर की जिद बचकानी लगती।
दृश्य कहाँ से शुरू करें
एग्री ने प्रवेश-बिंदु पर जो कहा, वह हर लेखक को याद रखना चाहिए। दृश्य वहाँ से शुरू कीजिए जहाँ टकराव पहले ही शुरू हो चुका हो।
नया लेखक दृश्य इस तरह शुरू करता है कि आदमी दरवाजे से आता है, बैठता है, पानी माँगता है, हालचाल पूछता है, और चौथे पन्ने पर असली बात कहता है। अनुभवी लेखक वहीं से शुरू करता है जहाँ असली बात है, और बाकी सब दर्शक को खुद समझ में आ जाता है।
एक अच्छा नियम यह है कि हर दृश्य को लिखने के बाद उसकी पहली एक-चौथाई पंक्तियाँ काटकर देखिए। दस में से आठ बार दृश्य बेहतर हो जाता है।
नकली संघर्ष से बचिए
कुछ किस्म के टकराव देखने में संघर्ष लगते हैं और असल में खोखले होते हैं।
गलतफहमी वाला संघर्ष। पूरी फिल्म इसलिए चल रही है कि दो लोग एक-दूसरे से एक सीधा सवाल नहीं पूछ रहे। दर्शक यह पकड़ लेता है और चिढ़ जाता है। गलतफहमी तभी काम करती है जब उसके पीछे कोई ठोस कारण हो, जैसे अभिमान, डर या वर्जना।
बिना कारण का खलनायक। जो आदमी केवल इसलिए बुरा है क्योंकि कहानी को एक बुरा आदमी चाहिए था, वह डरावना नहीं लगता। हर विरोधी अपनी नजर में सही होता है, और यही उसे असली बनाता है।
एक फोन से हट जाने वाली बाधा। अगर दर्शक सोच सकता है कि यह तो एक फोन करके सुलझ जाता, तो बाधा कच्ची है।
आम भूलें
- संघर्ष को हिंसा समझ लेना। सबसे तीखे दृश्य अक्सर मेज के दो तरफ बैठे दो लोगों के बीच बनते हैं।
- नायक के लिए दरवाजा खुला छोड़ देना। जब तक वह भाग सकता है, नाटक नहीं बनेगा।
- बहस को संघर्ष मान लेना। बहस में शब्द बदलते हैं, संघर्ष में स्थिति बदलती है।
- नायक पर दया करना। लेखक की सबसे महँगी कमजोरी यही है।
- सारा दबाव अंत के लिए बचा रखना। पहला अंक अगर सपाट है तो दर्शक अंत तक रुकेगा ही नहीं।
अभ्यास
अपनी कहानी का कोई एक दृश्य लीजिए, जो आपको खुद सुस्त लगता हो। उस पर चार काम कीजिए।
पहला, दोनों पात्रों की इच्छा एक-एक पंक्ति में लिखिए। अगर दोनों की इच्छा टकराती नहीं है, तो दृश्य में संघर्ष है ही नहीं।
दूसरा, लिखिए कि दोनों में से कोई उठकर क्यों नहीं जा सकता। अगर उत्तर नहीं सूझे, तो वह ताला अभी गढ़ना बाकी है।
तीसरा, दृश्य के शुरू और अंत की स्थिति लिखिए। अगर दोनों एक जैसी हैं, तो संघर्ष स्थिर है और दृश्य को दोबारा बनाना पड़ेगा।
चौथा, दृश्य की पहली एक-चौथाई पंक्तियाँ हटाकर पढ़िए।
सार
- संघर्ष का अर्थ लड़ाई नहीं, दो इच्छाओं का टकराव है जहाँ दोनों एक साथ पूरी नहीं हो सकतीं।
- टकराव तभी टिकता है जब दोनों पक्ष उससे भाग न सकें, इसलिए लेखक को वह ताला भी गढ़ना पड़ता है जो उन्हें बाँधे रखे।
- संघर्ष के चार दर्जे हैं: स्थिर, उछलता, बढ़ता और पूर्वाभास वाला। अच्छी पटकथा अंतिम दो पर चलती है।
- भारतीय परंपरा का सबसे गहरा संघर्ष धर्मसंकट है, यानी दो सही चीजों के बीच का चुनाव।
- दबाव बढ़ाने के चार तरीके हैं: समय-सीमा, विकल्पों की कमी, बढ़ती कीमत और मजबूत विरोधी।
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संदर्भ पुस्तकें: लाजोस एग्री, द आर्ट ऑफ ड्रामैटिक राइटिंग · भरत मुनि, नाट्यशास्त्र · सिडनी ल्यूमेट, मेकिंग मूवीज
संदर्भ फिल्में: मुग़ल-ए-आज़म (1960) · मदर इंडिया (1957) · शोले (1975) · दृश्यम (2015)
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