एक युद्धोत्तर संसार, और एक नई बेचैनी

बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक का उत्तरार्द्ध एक ऐसा समय था, जब विश्व अभी-अभी प्रथम महायुद्ध की विभीषिका से बाहर निकला था, और फ़िल्म-निर्माण तथा फ़िल्म-प्रदर्शन की स्थितियाँ भी, इसी उथल-पुथल के साथ-साथ, तेज़ी से बदल रही थीं। यह वह क्षण था, जब सिनेमा — जो अभी तक एक नवजात, अनिश्चित माध्यम भर था — पहली बार अपनी वास्तविक सामर्थ्य को पहचानने की दिशा में क़दम बढ़ा रहा था, और यह पहचान भारत और यूरोप, दोनों ही जगह, लगभग एक साथ घटित हो रही थी।

दादा साहेब फालके की फ़िल्मों को देखकर, फ़िल्म-निर्माण के इच्छुक अनेक रचनात्मक कलाकारों में एक सुगबुगाहट फैलने लगी थी। साथ ही, फालके की फ़िल्मों की आर्थिक सफलता की ख़बरें सुनकर, पूँजीपति व्यवसायी भी फ़िल्म-निर्माण की योजनाएँ बनाने लगे थे — अर्थात् एक ही फ़िल्मकार की उपलब्धि ने, अनजाने ही, दो भिन्न प्रकार की महत्त्वाकांक्षाओं को एक साथ जन्म दे दिया था: एक कलात्मक, और दूसरी विशुद्ध व्यावसायिक। फालके की फ़िल्में जमशेदजी फ्रामजी मदन के स्वामित्व वाले सिनेमाघरों में प्रदर्शित होकर लाखों रुपए कमा चुकी थीं, और इसी कारण मदन इस उधेड़बुन में थे कि किस प्रकार वे स्वयं फ़िल्में निर्मित करके अपने ही थियेटरों में प्रदर्शित करें।

जमशेदजी मदन की व्यावसायिक सूझ-बूझ: आयातित प्रतिभा का प्रयोग

किंतु फ़िल्म बनाने का जो ज्ञान फालके ने अत्यंत कठोर परिश्रम और एकाकी साधना के माध्यम से प्राप्त किया था, उस कठिन मार्ग से मदन सायास बचना चाहते थे। न तो उनके पास इतना धैर्य था, और न ही इतना अवकाश, कि वे स्वयं भारतीय प्रतिभाओं की खोज में निकलते और उन्हें उपयुक्त प्रशिक्षण देकर धीरे-धीरे विकसित होने का अवसर प्रदान करते। फ़िल्म-निर्माण में बाधा बनने वाली इन समस्त व्यावहारिक समस्याओं का उन्होंने एक अत्यंत चतुर, व्यावसायिक समाधान खोज निकाला। वे विगत पंद्रह वर्षों से यूरोप के विभिन्न देशों से कैमरे, प्रक्षेपण-यंत्र तथा बनी-बनाई फ़िल्में मँगवाते ही आ रहे थे, इसलिए उन्हें यह विचार तनिक भी असाधारण नहीं लगा कि क्यों न यूरोप से ही कैमरामैन, निर्देशक, तथा अभिनेत्रियाँ और अभिनेता भी आयात कर लिए जाएँ — मानो सिनेमा का संपूर्ण ढाँचा ही, मशीनों की भाँति, विदेश से मँगवाया जा सकने वाला एक उत्पाद हो। यह दृष्टिकोण भारतीय सिनेमा के इतिहास में व्यवसाय और कला के उस स्थायी द्वंद्व का एक आरंभिक, किंतु अत्यंत स्पष्ट उदाहरण है, जो आगे आने वाले दशकों में भी निरंतर दोहराया जाता रहा।

संख्याओं की भाषा में एक उभरता उद्योग

बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में भारत में फ़िल्म-निर्माण की गति को यदि आँकड़ों की भाषा में देखा जाए, तो यह क्रमिक, किंतु निरंतर बढ़ती हुई प्रगति स्पष्ट दिखाई देती है — सन् 1913 में केवल दो फ़िल्में बनीं, 'राजा हरिश्चंद्र' और 'मोहिनी-भस्मासुर'; सन् 1914 में मात्र एक, 'सावित्री-सत्यवान'; सन् 1915 में भी केवल एक, एस० एन० पाटणकर द्वारा निर्देशित 'नारायण राव पेशवा की हत्या'; सन् 1917 में यह संख्या बढ़कर चार हो गई, सन् 1918 में सात, सन् 1919 में अठारह, और सन् 1922 तक पहुँचते-पहुँचते अट्ठावन फ़िल्में प्रतिवर्ष बनने लगी थीं। यह संख्यात्मक वृद्धि केवल उत्पादन की गति का सूचक भर नहीं है — यह इस बात का भी प्रमाण है कि सिनेमा अब एक अकेले साधक (फालके) का प्रयोग भर नहीं रह गया था, बल्कि एक समूचा उद्योग उसकी छाया में तेज़ी से आकार ले रहा था।

एस० एन० पाटणकर: असफलता से सीखकर आगे बढ़ने की कहानी

दादा साहेब फालके की तीन फ़िल्में — 'राजा हरिश्चंद्र', 'मोहिनी-भस्मासुर' तथा 'सावित्री-सत्यवान' — देखने के पश्चात् ही एस० एन० पाटणकर को अपनी पहली फ़िल्म बनाने की प्रेरणा मिली थी। अपने मित्रों से धन एकत्र करके उन्होंने सावे दादा से एक कैमरा ख़रीदा, और अपनी पहली फ़िल्म 'सावित्री-सत्यवान' बनाने में जुट गए। किंतु किसी तकनीकी भूल के कारण फ़िल्म-पट्टी पर कुछ भी अंकित नहीं हो सका — यह उस दौर के फ़िल्मकारों के सामने खड़ी उन अनगिनत व्यावहारिक कठिनाइयों का एक छोटा-सा उदाहरण भर है, जिनसे जूझकर ही भारतीय सिनेमा अपने प्रारंभिक वर्षों में आगे बढ़ा। इस असफलता से विचलित हुए बिना, पाटणकर और उनके मित्रों ने पहले एक लघु फ़िल्म बनाकर कैमरे के उपयोग को भली-भाँति सीखा, और इसी निरंतर अभ्यास के परिणामस्वरूप सन् 1915 में वे 'नारायण राव पेशवा की हत्या' नामक फ़िल्म बनाने में सफल हुए — यह फ़िल्म अठारहवीं शताब्दी के उस ऐतिहासिक प्रसंग पर आधारित थी, जब पाँचवें पेशवा नारायण राव की दुखद हत्या हुई थी। इस फ़िल्म का प्रथम प्रदर्शन पुणे के आर्यन थियेटर में हुआ, और यह फ़िल्म दर्शकों द्वारा अत्यंत पसंद की गई।

आत्माभिव्यक्ति का युग: जब सिनेमा अभी व्यवसाय नहीं बना था

सिनेमा के ये आरंभिक प्रयास मूलतः प्रयोगात्मक ही थे। इन फ़िल्मों का निर्माण करते समय इनके रचनाकारों के समक्ष आत्माभिव्यक्ति का प्रश्न ही सर्वोपरि था — सिनेमा का तब तक पूर्ण व्यावसायीकरण नहीं हुआ था, और यही इस युग की सबसे बड़ी विशेषता भी थी। विश्वभर के मूक-सिनेमा-युग की सबसे उल्लेखनीय बात यही है कि नई-नई रचनात्मक प्रतिभाओं ने उत्सुकता और ताज़े, मौलिक विचारों के साथ इस नवजात कला-विधा को अपनाया। सिनेमा के आरंभिक वर्षों में केवल कुछ ही लोगों ने इसे महज़ एक जादुई खिलौना समझा; इसके विपरीत, ऐसे लोगों की संख्या कहीं अधिक थी, जो यह गहराई से समझते थे कि चलते-फिरते बिंबों की इस सर्वथा नई तकनीक को अपनाकर वे अपने विचारों को एक सर्वथा नए, अभूतपूर्व ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं।

वैज्ञानिकों और विचारकों की सजग दृष्टि

वैज्ञानिक तथा आविष्कारक सदैव ही इस नवीन विधा को नई-नई उत्तेजना और नए आयाम देने का प्रयत्न करते रहे, क्योंकि अनेक वैज्ञानिक इस तथ्य को खुले मन से स्वीकार कर चुके थे कि यह एक ऐसा वैज्ञानिक आविष्कार है, जो आगे चलकर संभवतः मानव की सोच और मानवीय विचारों को सर्वाधिक गहराई से प्रभावित करेगा। उस समय के अनेक चिंतक और विचारक भी इस दूरगामी संभावना से अनभिज्ञ नहीं थे। आगे चलकर हम यह विस्तार से देखेंगे कि बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों में क्रांति की लड़ाई में संलग्न, तथा नए विचारों को अपनाने में सर्वाधिक उत्सुक राष्ट्र — रूस — ने इस कला-विधा को किस अभूतपूर्व ऊँचाई तक पहुँचाया। रूस के शीर्ष नेता व्लादिमीर लेनिन ने तो सिनेमा को समस्त कलाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और सर्वाधिक शक्तिशाली विधा घोषित कर दिया था — उनका यह प्रसिद्ध कथन, "हमारे लिए समस्त कलाओं में सिनेमा सबसे महत्त्वपूर्ण है," आगे चलकर सोवियत फ़िल्म-नीति की आधारशिला बना। यह उल्लेखनीय है कि संपूर्ण विश्व में सिनेमा पर गंभीर चिंतन-मनन का कार्य सन् 1915 से ही, अर्थात् वैचेल लिंडसे की पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही, आरंभ हो चुका था — भारत में आत्माभिव्यक्ति के ये प्रयोग, और विश्वभर में सिनेमा-सिद्धांत के ये आरंभिक प्रयत्न, वस्तुतः एक ही व्यापक बौद्धिक जागृति के दो समांतर, परस्पर-संबद्ध पक्ष थे।

विरासत: भारतीय सिनेमा के इस युग को दर्ज करने वाली पुस्तकें

भारतीय सिनेमा के इस आरंभिक, प्रयोगात्मक युग को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने और विश्लेषित करने वाली कुछ पुस्तकें आगे चलकर सामने आईं, जिन्होंने इस बिखरे हुए इतिहास को एक सुसंगत कथा का रूप दिया। एरिक बारनौ और एस० कृष्णस्वामी की संयुक्त कृति 'इंडियन फ़िल्म' (1963) को भारतीय सिनेमा के इतिहास पर लिखी गई पहली गंभीर, विद्वत्तापूर्ण अंग्रेज़ी पुस्तक माना जाता है, जिसमें फालके से लेकर स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय सिनेमा के समूचे विकास-क्रम का प्रामाणिक दस्तावेज़ीकरण मिलता है। इसके पश्चात् फ़िरोज़ रंगूनवाला की 'इंडियन फ़िल्मोग्राफ़ी' तथा बी० डी० गर्गा की 'सो मैनी सिनेमाज़: द मोशन पिक्चर इन इंडिया' जैसी कृतियों ने भारतीय सिनेमा के इस आरंभिक काल को और अधिक विस्तार तथा सूक्ष्मता के साथ अभिलेखित किया।

इसी दौर में, रूस में घटित हो रही उस सिनेमाई क्रांति को समझने के लिए, अमरीकी फ़िल्म-इतिहासकार जे लाइडा ने अपनी अत्यंत प्रामाणिक मानी जाने वाली कृति 'कीनो: अ हिस्ट्री ऑफ़ द रशियन एंड सोवियत फ़िल्म' (1960) लिखी — यह पुस्तक आज भी रूसी और सोवियत सिनेमा के अध्ययन की आधारभूत संदर्भ-ग्रंथ मानी जाती है, और यह ठीक उसी बौद्धिक जागृति की अगली कड़ी के रूप में पढ़ी जा सकती है, जिसका उल्लेख इस निबंध में लेनिन के कथन के माध्यम से हुआ है। इस प्रकार, भारत में फालके और पाटणकर के प्रयोगात्मक संघर्ष, तथा रूस में सिनेमा को राष्ट्र-निर्माण की सर्वोच्च शक्तिशाली विधा मान लेने का साहसिक निर्णय — ये दोनों ही धाराएँ, अपनी-अपनी भिन्न परिस्थितियों में, एक ही ऐतिहासिक सत्य की ओर संकेत करती हैं: कि बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक, सिनेमा विश्वभर में एक नवजात खिलौने से उठकर, एक गंभीर, सभ्यता-निर्माणकारी शक्ति के रूप में पहचाना जाने लगा था।